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आर्य वीर नेत्र चिकित्सालय
(पंजीकृत चैरिटेबल ट्रस्ट)
 
 
 
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प्रधान जी की कलम से

कुर्वन्नेवहे कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतेऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।

परम पुनीत यजुर्वेद ने उपरोक्त मंत्र के माध्यम से आदेश दिया कि मनुष्य कर्म करता हुआ सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करे।

वेद भगवान के इस आदेश का पालन करने हेतु तथा युग प्रवर्तक महर्षि दयानन्द द्वारा मनुष्य मात्र के हितार्थ आर्यसमाज के नियम बनाये जिस में छठे नियम ष्संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करनाष् से प्रेरित होकर आर्य वीर दल गुड़गांव के कर्मठ कार्यकर्ताओं एवं इन पुण्यात्माओं सर्व श्री राम चन्द्र आर्य, ओम प्रकाश आर्य, शिवदत्त आर्य तथा डा0 त्रिलोक नाथ आहूजा एवं इनके साथ-साथ सर्वश्री फतेहचन्द अग्रवाल, यशपाल महेन्दू, ओम प्रकाश मदान इन सब ने 15 मार्च 1970 के भाग्यशाली दिवस को नेत्र रोगों से पीड़ित जनता के हितार्थ आर्य वीर नेत्र चिकित्सालय की स्थापना आर्य समाज अर्जुन नगर के प्रांगण में की। मुझे उर्दु के शायर का एक शेर याद आ रहा हैः-

जब तक कि ग़मे इन्सां से ‘जिगर‘ इन्सां का दिल मामूर नहीं
जन्नत ही सही दुनिया, लेकिन जन्नत से जहन्नुम दूर नहीं।।


उर्दु के शायर ‘जिगर के हृदय के उद्गार बहुत ही अर्थपूर्ण है। उन का कहना है कि जब तक मनुष्य का दिल मनुष्य की पीड़ा को अनुभव कर के द्रवित नहीं होता तो भले ही यह संसार स्वर्ग हो, उस सूरत में जब व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के दर्द को नहीं समझता तो वह नरक से दूर नहीं रह पाता।
1970 में लगाया गया यह पौधा आज एक वट वृक्ष का रूप धारण कर चुका है जिस की शाखाओं का आश्रय सैकड़ो पक्षी ले रहे हैं तथा जिसकी छाया असंख्य पथिकों को शीतलता प्रदान कर रही है। अनेकों नेत्र रोगी लाभान्वित हो चुके हैं। अनेकों के आगामी अंधकार पूर्ण जीवन को नेत्र आप्रेशन के द्वारा प्रकाश प्राप्त हो चुका है।


 
 
 
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